संकेतगुप्तिशास्त्रम्। सूचनासिद्धान्तस्य संस्कृतसंहितायां (२ एप्रिल्) मापं, सङ्कोचनं, वाहनमार्गं च निरूपितम्। अत्र तस्य गुप्तपक्षः. कथं सन्देशः शत्रोरगोचरः स्यात्, तथापि अभिप्रेताय बोध्यः। शनन्-पूर्णगुप्तेः स्मृत्या आरभ्य प्रकाश्यतन्त्रन्यायं, समविषमबीजं, एकमार्गीयसङ्क्षेपं, हस्ताक्षरं, कुञ्चिकासम्पर्धं, प्रमाणं च यावत् द्वादश पद्यानि। वितरितसम्मति-कालतर्काः नानुवर्ण्यन्ते; केवलं गूढसंकेतः।
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English title
संकेतगुप्तिशास्त्रम्: A Metrical Codification of Cryptography after Shannon
Context and topics
This verse treatise is part of the 2026 Sanskrit systems series (reader format). Primary topics: cryptography, information-theory, shannon, security and public-key.
How to read
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Note
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पूर्ण-शीर्षकम्
संकेतगुप्तिशास्त्रम्: A Metrical Codification of Cryptography after Shannon
परम्परा-सन्धिः
| पूर्वं | अत्र किम् उपचीयते | किं न पुनरुच्यते |
|---|---|---|
| सूचनासिद्धान्तस्य संस्कृतसंहिता | एन्ट्रॉपी, वाहनक्षमता, सङ्केतनम् | मापसूत्रमात्रम् |
| कालतर्कशास्त्रम् | प्राक्त्वम्, क्षणचित्रम् | घटिकान्यायः |
| वितरितसम्मतिशास्त्रम् | एकवाक्यता | Paxos/Raft |
| इदं शास्त्रम् | गुप्तिः, बीजम्, एकमार्गीयम्, हस्ताक्षरः, सम्पर्धः, प्रमाणम् | - |
ग्राह्य-त्याज्य-विवेकः
ग्राह्यम्
१. पूर्णगुप्तिः: Shannon perfect secrecy; |K| ≥ |M| भावः।
२. केर्क्हॉफ्-न्यायः: तन्त्रं प्रकाश्यम्; बीजं गोप्यम्।
३. समबीजगूढनम्: एकं गोप्यबीजम् उभयोः।
४. विषमबीजम्: प्रकाश्य/गोप्ययुग्मम्।
५. एकमार्गीयसङ्क्षेपः: hash; पूर्वबिम्बदुर्लभता।
६. हस्ताक्षरः: अखण्डता + कर्तृत्वम्।
७. कुञ्चिकासम्पर्धः: Diffie-Hellman-धर्मीयः।
८. प्रमाणनम् / सन्देशप्रमाणकम्: authenticity; सूचनामात्रगुप्तेः परम्।
९. सङ्गणनदुर्लभता: computational security vs information-theoretic.
त्याज्यम्
- विशिष्टबिट्सङ्ख्याः (AES-१२८ इत्यादि) नित्यपरिवर्तनशीलाः।
- पेटेण्ट-इतिहासकथाः।
- पूर्णप्रमाणलेखानुवादः. न्यायसार एव।
अध्याय-योजना
| प्रकरणम् | विषयः | छन्दः | श्लोकाः |
|---|---|---|---|
| १ | मङ्गलं शनन्-सन्धिश्च | अनुष्टुभ् | २ |
| २ | पूर्णगुप्तिः | अनुष्टुभ् | १ |
| ३ | केर्क्हॉफ्-न्यायः | अनुष्टुभ् | १ |
| ४ | समबीजं विषमबीजं च | उपजाति | १ |
| ५ | एकमार्गीयसङ्क्षेपः | अनुष्टुभ् | २ |
| ६ | हस्ताक्षरः | अनुष्टुभ् | १ |
| ७ | कुञ्चिकासम्पर्धः | अनुष्टुभ् | १ |
| ८ | प्रमाणनं सन्देशप्रमाणकं च | अनुष्टुभ् | १ |
| ९ | सङ्गणनदुर्लभता | उपजाति | १ |
| १० | उपसंहारः | अनुष्टुभ् | १ |
पारिभाषिक-कोशः
| आधुनिकम् | संस्कृतम् | टिप्पणी |
|---|---|---|
| cryptography | संकेतगुप्तिः / गूढलेखनम् | संकेत + गुप्ति |
| plaintext | स्फुटपाठः / प्रकाश्यपाठः | |
| ciphertext | गूढपाठः | |
| key | बीजम् / कुञ्चिका | |
| perfect secrecy | पूर्णगुप्तिः | Shannon |
| Kerckhoffs’s principle | प्रकाश्यतन्त्रन्यायः | |
| symmetric crypto | समबीजगूढनम् | |
| public-key / asymmetric | विषमबीजम् / प्रकाश्यबीजम् | |
| one-way function | एकमार्गीयम् | |
| hash | सङ्क्षेपचिह्नम् / एकमार्गीयसङ्क्षेपः | |
| preimage resistance | पूर्वबिम्बदुर्लभता | |
| collision resistance | सङ्घट्टदुर्लभता | |
| digital signature | डिजिटल → हस्ताक्षरः / चिह्नहस्तः | |
| Diffie-Hellman | कुञ्चिकासम्पर्धः | shared secret over open channel |
| MAC | सन्देशप्रमाणकम् | |
| authentication | प्रमाणनम् / प्रामाण्यम् | |
| computational security | सङ्गणनदुर्लभगुप्तिः | |
| information-theoretic security | सूचनासिद्धगुप्तिः |
श्लोकः १ (अनुष्टुभ्)
अधुना गुप्तिशास्त्रं तु तस्याः पृष्ठे विधीयते ॥१॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
मापे सङ्कोचने मार्गे शनन्नीतिः पुरा श्रुता ।
अधुना गुप्तिशास्त्रं तु तस्याः पृष्ठे विधीयते ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| मापे | in quantification (entropy etc.) |
| सङ्कोचने | in compression |
| मार्गे | in the channel |
| शनन्नीतिः | Shannon’s doctrine |
| गुप्तिशास्त्रम् | cryptography |
| तस्याः पृष्ठे | on its reverse / as its sequel |
व्युत्पत्तिः
गुप्तिः: √गुप् + क्तिन्। शनन्: Claude Shannon नाम्नः ध्वन्यानुकृतिः (पूर्वसंहितानुसारेण)।
वृत्तमिति: ८-८-८-८।
श्लोकः २ (अनुष्टुभ्)
मित्राय बोध्यं शत्रोस्तु तमोमयमिदं फलम् ॥२॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
स्फुटं गूढेन संवेष्ट्य बीजेन च नियन्त्रितम् ।
मित्राय बोध्यं शत्रोः तु तमोमयमिदं फलम् ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| स्फुटम् | plaintext |
| गूढेन संवेष्ट्य | wrapped as ciphertext |
| बीजेन नियन्त्रितम् | keyed |
| मित्राय बोध्यम् | intelligible to the intended party |
| शत्रोः तमोमयम् | opaque to the adversary |
| फलम् | the goal of the art |
सन्धिः: शत्रोः + तु → शत्रोस्तु।
श्लोकः ३ (अनुष्टुभ्)
पूर्णा गुप्तिस्तदा प्रोक्ता बीजं सन्देशान्न हीयते ॥३॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
गूढे दृष्टे अपि स्फुटस्य न ज्ञानं चेत् विवर्धते ।
पूर्णा गुप्तिः तदा प्रोक्ता । बीजं सन्देशात् न हीयते ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| गूढे दृष्टेऽपि | even given the ciphertext |
| स्फुटस्य ज्ञानम् | knowledge of the plaintext |
| न विवर्धते | does not increase (posterior = prior) |
| पूर्णा गुप्तिः | perfect secrecy |
| बीजं सन्देशान्न हीयते | key material is not shorter than the message (OTP spirit: |K| ≥ |M|) |
सन्धिः: दृष्टे + अपि → दृष्टेऽपि; सन्देशतः + अधिकम् → सन्देशतोऽधिकम्।
न्यायः: Shannon: I(M;C)=0 when key is fresh, uniform and long enough (OTP).
श्लोकः ४ (अनुष्टुभ्)
शत्रुणा विदितेऽप्यस्मिन् गुप्तिः बीजे स्थिता भवेत् ॥४॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
तन्त्रं प्रकाश्यं सद्भावे बीजम् एव तु गोपयेत् ।
शत्रुणा विदिते अपि अस्मिन् गुप्तिः बीजे स्थिता भवेत् ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| तन्त्रं प्रकाश्यम् | algorithm may be public |
| सद्भावे | in the right design |
| बीजमेव गोपयेत् | only the key is secret |
| विदितेऽप्यस्मिन् | even if the system is known |
| गुप्तिः बीजे | secrecy resides in the key |
सन्धिः: विदिते + अपि + अस्मिन् → विदितेऽप्यस्मिन्।
न्यायः: Kerckhoffs: security must not rely on obscurity of the mechanism.
श्लोकः ५ (उपजाति)
रहस्यभूतं गूढविधिः समोक्तः ।
प्रकाश्यगोप्ययुगलं तु यत्र
विषमबीजं तद् उदाहरन्ति ॥५॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
यदि स्यात् बीजम् उभयोः समं हि रहस्यभूतं गूढविधिः समोक्तः ।
प्रकाश्यगोप्ययुगलं तु यत्र विषमबीजं तत् उदाहरन्ति ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| समं रहस्यम् | shared secret key |
| उभयोः | of both parties |
| गूढविधिः समोक्तः | symmetric encryption |
| प्रकाश्यगोप्ययुगलम् | public/private key pair |
| विषमबीजम् | asymmetric / public-key |
वृत्तमिति: एकादशाक्षराः पादाः।
श्लोकः ६ (अनुष्टुभ्)
सङ्क्षेपचिह्नं तद्धर्मं धारयत्येकमार्गवत् ॥६॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
एकमार्गे सुकरं स्यात् प्रतीपे तु सुदुष्करम् ।
सङ्क्षेपचिह्नं तत् धर्मं धारयति एकमार्गवत् ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| एकमार्गे | in the forward direction |
| सुकरम् | easy (to compute) |
| प्रतीपे | in reverse (preimage) |
| सुदुष्करम् | hard |
| सङ्क्षेपचिह्नम् | cryptographic hash output |
| एकमार्गवत् | like a one-way function |
व्युत्पत्तिः
सङ्क्षेप: सम् + √क्षिप् + घञ्। चिह्नम्: √चिह्न्।
श्लोकः ७ (अनुष्टुभ्)
अखण्डतायै साक्षित्वे सङ्क्षेपः परिगृह्यते ॥७॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
पूर्वबिम्बं न लभ्यं स्यात् सङ्घट्टः अपि सुदुर्लभः ।
अखण्डतायै साक्षित्वे सङ्क्षेपः परिगृह्यते ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| पूर्वबिम्बम् | preimage |
| सङ्घट्टः | collision (two inputs, one digest) |
| सुदुर्लभः | resistant / hard to find |
| अखण्डतायै | for integrity |
| साक्षित्वे | as a fingerprint / commitment aid |
सन्धिः: सङ्घट्टः + अपि → सङ्घट्टोऽपि।
श्लोकः ८ (अनुष्टुभ्)
कर्तृत्वमखण्डता च हस्ताक्षरे प्रतिष्ठिते ॥८॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
गोप्यबीजेन चिह्नं स्यात् प्रकाश्येन परीक्ष्यते ।
कर्तृत्वम् अखण्डता च हस्ताक्षरे प्रतिष्ठिते ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| गोप्यबीजेन | with the private key |
| चिह्नम् | signature |
| प्रकाश्येन परीक्ष्यते | is verified with the public key |
| कर्तृत्वम् | authorship / non-repudiation spirit |
| अखण्डता | integrity |
| हस्ताक्षरे प्रतिष्ठिते | established in the digital signature |
वृत्तमिति: ८-८-८-८।
श्लोकः ९ (अनुष्टुभ्)
मध्यस्थयन्त्रतः शत्रुर्नानुमातुं प्रभुर्भवेत् ॥९॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
प्रकाश्ये सति मार्गे अपि द्वौ कुरुतः सहजातम् ।
रहस्यं यन्त्रमध्यात् तु शत्रुः न अनुमिमीत वै ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| प्रकाश्ये मार्गे | on a public channel |
| द्वौ कुरुतः | two parties compute |
| सहजातम् | jointly born shared secret |
| यन्त्रमध्यात् | from exchanged public values |
| नानुमिमीत | cannot feasibly infer (under hardness) |
सन्धिः: मार्गे + अपि → मार्गेऽपि; न + अनुमिमीत → नानुमिमीत।
न्यायः: Diffie-Hellman: public g, gᵃ, gᵇ; shared gᵃᵇ; discrete-log hardness.
श्लोकः १० (अनुष्टुभ्)
सन्देशप्रमाणकेन स्यात् कर्ता सत्यं च रक्षितम् ॥१०॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
गुप्तिः गोपनमात्रं स्यात् प्रामाण्यं तु पृथक् बलम् ।
सन्देशप्रमाणकेन स्यात् कर्ता सत्यं च रक्षितम् ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| गुप्तिः | confidentiality |
| गोपनमात्रम् | secrecy alone |
| प्रामाण्यम् | authenticity |
| पृथग् बलम् | a separate strength |
| सन्देशप्रमाणकम् | MAC (message authentication code) |
| कर्ता सत्यं च | origin and integrity |
सन्धिः: गुप्तिः + गोपन → गुप्तिर्गोपन…; पृथक् + बलम् → पृथग् बलम् (optional external).
श्लोकः ११ (उपजाति)
बीजभराद् धि शास्त्रमिदं जगौ ।
दुष्करतायां तु सङ्गणनस्य
गुप्तिं श्रयन्ते बहवस्तन्त्रज्ञाः ॥११॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
पूर्णा गुप्तिः जगति दुर्लभा स्यात् । बीजभरात् हि शास्त्रम् इदं जगौ ।
दुष्करतायां तु सङ्गणनस्य गुप्तिं श्रयन्ते बहवः तन्त्रज्ञाः ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| पूर्णा गुप्तिः | information-theoretic perfect secrecy |
| दुर्लभा | rare in ordinary deployment |
| बीजभरात् | from the burden of keys |
| दुष्करतायाम् | in (reliance on) hardness |
| सङ्गणनस्य | of computation |
| श्रयन्ते | take refuge in |
| तन्त्रज्ञाः | systems/crypto engineers |
न्यायः: modern crypto mostly computational; Shannon perfect secrecy is the ideal pole.
श्लोकः १२ (अनुष्टुभ्)
गुप्तिं प्रामाण्ययोगेन संकेतं रक्षयेद् बुधः ॥१२॥
पदच्छेदः · शब्दार्थः · व्युत्पत्तिः
पदच्छेदः
बीजं गोपयेत् तन्त्रं च प्रकाशयेद् बुधः सदा ।
गुप्तिं प्रामाण्ययोगेन संकेतं रक्षयेत् बुधः ॥
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| बीजं गोपय | keep the key secret |
| तन्त्रं प्रकाशयतु | publish the design (Kerckhoffs) |
| गुप्तिं प्रामाण्ययोगेन | confidentiality joined to authenticity |
| संकेतं रक्षयेत् | protect the message/signal |
| बुधः | the wise practitioner |
उपसंहारन्यायः: शनन् मापयति; इदं शास्त्रं गोपनं प्रमाणयति च। उभौ मिलित्वा सूचनायाः पूर्णरक्षा।
श्लोकसूची
१. शनन्-मापात् परं गुप्तिः
२. स्फुटं → गूढं; मित्राय बोध्यम्
३. पूर्णगुप्तिः · बीज ≥ सन्देश
४. प्रकाश्यतन्त्रन्यायः
५. समबीजं · विषमबीजम्
६. एकमार्गीयसङ्क्षेपः
७. पूर्वबिम्बं · सङ्घट्टः
८. हस्ताक्षरः
९. कुञ्चिकासम्पर्धः
१०. प्रामाण्यं · सन्देशप्रमाणकम्
११. सङ्गणनदुर्लभगुप्तिः
१२. बीजं गोपय · तन्त्रं प्रकाशय
अग्रे (नेदं प्रकरणम्)
- निरोधचिह्नशास्त्रम्: fencing tokens, सदस्यतापरिवर्तनम्।
- शून्यज्ञानप्रमाणम्: zero-knowledge (विषमबीजविस्तारः)।
सन्दर्भाः
- Shannon: Communication theory of secrecy systems (1949).
- Kerckhoffs: La cryptographie militaire.
- Diffie & Hellman: New directions in cryptography.
- Goldwasser, Micali, Rivest et al.: foundations of modern crypto (signatures, hardness).
- Katz & Lindell: Introduction to Modern Cryptography (survey-level).
- पूर्वतनी: सूचनासिद्धान्तस्य संस्कृतसंहिता (२०२६-०४-०२); कालतर्कशास्त्रम् (२०२६-०७-०२)।